Alzheimer (Hindi)

धुँधलाती स्मृतियाँ

तुम अब कहाँ हो, प्रिये?
उस स्त्री में तो नहीं
जिसने मेरे संग साठ बरस बिताए।

वह तो धीरे-धीरे
धुँध के उस पार चली गई है,
जहाँ बच्चों के नाम नहीं पहुँचते,
जहाँ कल की बातें
सुबह तक जीवित नहीं रहतीं।

अब तो कभी एक किशोरी लौट आती है—
रंगों की किताब लेकर,
नई पेंसिलों को जैसे कोई ख़ज़ाना समझती हुई।

कभी किसी अजनबी की नज़र पड़ जाए
तो सहसा सकुचा जाती हो—
जैसे मन ने अब भी
लज्जा का एक पुराना दीप बचा रखा हो।

और मैं बैठा सोचता हूँ—
तुम कौन हो इस क्षण?

मेरी वह जीवन-संगिनी,
जिसने मेरे साथ सुख-दुःख के लंबे रास्ते तय किए,
और कभी मन ही मन मुस्कराकर
उन सबको ग़लत सिद्ध किया
जिन्होंने हमारे साथ पर संदेह किया था?

या कोई बहुत छोटी लड़की,
जिसे मैं कभी जानता ही न था?

फिर भी—
जब मैं तुम्हारा हाथ थामता हूँ,
कभी-कभी तुम्हारी उँगलियाँ
मेरी पकड़ का उत्तर देती हैं।

बस उतने क्षण में
मैं अपने सारे प्रश्न भूल जाता हूँ।

नाम चले जाएँ,
वर्ष खो जाएँ,
चेहरे भी धुँधले पड़ जाएँ—

यदि स्पर्श की स्मृति बची है,
तो शायद
मैं अभी पूरी तरह खोया नहीं हूँ।

 

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